श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.1.127 
গোষ্ঠী-সঙ্গে মুকুন্দ-সঞ্জয পুণ্যবন্ত
যে হৈল আনন্দ, তাহার নাহি অন্ত
गोष्ठी-सङ्गे मुकुन्द-सञ्जय पुण्यवन्त
ये हैल आनन्द, ताहार नाहि अन्त
 
 
अनुवाद
अपने सम्बन्धियों के साथ परम धर्मात्मा मुकुन्द संजय को असीम सुख का अनुभव हुआ।
 
The most pious Mukunda Sanjaya experienced immense happiness with his relatives.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)