श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  2.1.106 
এত বলি’ শ্বাস ছাডি’ পুনঃ-পুনঃ কান্দে
লোটায ভূমিতে কেশ, তাহা নাহি বান্ধে
एत बलि’ श्वास छाडि’ पुनः-पुनः कान्दे
लोटाय भूमिते केश, ताहा नाहि बान्धे
 
 
अनुवाद
यह कहकर प्रभु ने गहरी आह भरी और बार-बार रोए। उनके बाल खुले हुए थे और ज़मीन पर बिखरे हुए थे।
 
Having said this, the Lord sighed deeply and wept repeatedly. His hair was loose and scattered on the ground.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)