श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  2.1.101 
পুনঃ-পুনঃ হয বাহ্য, পুনঃ-পুনঃ পডে
দৈবে রক্ষা পায নাক-মুখ সে আছাডে
पुनः-पुनः हय बाह्य, पुनः-पुनः पडे
दैवे रक्षा पाय नाक-मुख से आछाडे
 
 
अनुवाद
प्रभु बार-बार होश में आते और बार-बार बेहोश हो जाते। हालाँकि उनकी नाक और चेहरा ज़मीन पर गिरे, फिर भी ईश्वरीय कृपा से उनकी रक्षा हुई।
 
The Lord repeatedly regained consciousness and fainted. Although his nose and face fell to the ground, he was protected by divine grace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)