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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 8: जगन्नाथ मिश्र का तिरोभाव
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श्लोक 80
श्लोक
1.8.80
জগন্নাথ-মিশ্র-পা’য বহু নমস্কার
অনন্ত-ব্রহ্মণ্ড-নাথ পুত্র-রূপে যাঙ্’র
जगन्नाथ-मिश्र-पा’य बहु नमस्कार
अनन्त-ब्रह्मण्ड-नाथ पुत्र-रूपे याङ्’र
अनुवाद
मैं श्री जगन्नाथ मिश्र के चरणों में अनंत वंदना करता हूँ, जिनके पुत्र असंख्य ब्रह्माण्डों के स्वामी थे।
I offer my infinite obeisances to the feet of Sri Jagannatha Mishra, whose sons were the masters of countless universes.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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