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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 8: जगन्नाथ मिश्र का तिरोभाव
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श्लोक 202
श्लोक
1.8.202
হেন দেহ পাইযা কৃষ্ণে নাহি হৈল রতি
কতকাল গিযা আর ভুঞ্জিবে দুর্গতি!
हेन देह पाइया कृष्णे नाहि हैल रति
कतकाल गिया आर भुञ्जिबे दुर्गति!
अनुवाद
"इन लोगों ने मानव जीवन प्राप्त करने के बाद भी कृष्ण के प्रति आसक्ति विकसित नहीं की है! वे कब तक ऐसी दुर्गति सहते रहेंगे?
“These people have not developed attachment to Krishna even after attaining human life! How long will they continue to suffer such misery?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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