श्री गौरचन्द्र का सुन्दर मुख देखकर माता शची को दुःख तो क्या, अपनी आत्मा भी भूल गई।
Seeing the beautiful face of Shri Gaurchandra, Mother Shachi not only felt sad but also forgot her own soul.
तात्पर्य
प्रेम-विहार के साकार श्री निम्आइ के सुंदर कमल-मुख को देखकर वैकुंठ में रहनेवाले उनके लीला-निरपेक्ष नित्य-सिद्ध मुक्त जन भी स्वयं को भूल गए तथा इंद्रिय-सुखों की इच्छा छोड़ दी। गौरांग कृष्ण से विमुख अज्ञानाधीन बद्ध जीव दुर्गा के क्षणभंगुर सुखमात्र-विषयक राज्य में शरीर को ही अपना मानते हैं। शरीर को आत्मा मानने के कारण ये गधा और गाय से बढ़ने नहीं हैं और त्रिविध तापों से आक्रांत रहते हैं। श्री शचीदेवी तो शांति और सुख की साकार रूपा हैं। वे नित्य सिद्ध मुक्त और वत्सल्य-रस की परम आश्रय हैं। श्री शचीदेवी निष्काम भाव से गौर की निरंतर सेवा में नियोजित रहती हैं, फिर उन्हें अज्ञानजनित त्रिविध तापों की क्या पीडा होगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)