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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 8: जगन्नाथ मिश्र का तिरोभाव
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श्लोक 107
श्लोक
1.8.107
পুঙ্থি ছাডি’ নিমাঞি না জানে কোন কর্ম
বিদ্যা-রস তা’র হৈযাছে সর্ব-ধর্ম
पुङ्थि छाडि’ निमाञि ना जाने कोन कर्म
विद्या-रस ता’र हैयाछे सर्व-धर्म
अनुवाद
"उसे अपनी पढ़ाई के अलावा किसी और चीज़ में रुचि नहीं है, मानो वही उसका जीवन और आत्मा बन गया हो।"
"He is not interested in anything other than his studies, as if that has become his life and soul."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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