श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 8: जगन्नाथ मिश्र का तिरोभाव  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.8.100 
চতুর্-মুখ, পঞ্চ-মুখ, সহস্র-বদন
সবেই গাযেন,—“জয শ্রী-শচীনন্দন”
चतुर्-मुख, पञ्च-मुख, सहस्र-वदन
सबेइ गायेन,—“जय श्री-शचीनन्दन”
 
 
अनुवाद
“ब्रह्मा, शिव, अनंत शेष - सभी ने जप किया, ‘जय शचीनंदन!’
 
“Brahma, Shiva, Ananta Sesha – all chanted, ‘Jai Sachinandan!’
तात्पर्य
चतुर्मुख शब्द भगवान ब्रह्मा के लिए प्रयुक्त होता है, पंचमुख शब्द भगवान शिव के लिए प्रयुक्त होता है और सहस्रवदन शब्द श्री शेष या अनंत के लिए प्रयुक्त होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)