श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  1.7.94 
যে শুনযে বিশ্বরূপ-প্রভুর সন্ন্যাস
কৃষ্ণ-ভক্তি হয তার ছিণ্ডে কর্ম-ফাঙ্স
ये शुनये विश्वरूप-प्रभुर सन्न्यास
कृष्ण-भक्ति हय तार छिण्डे कर्म-फाङ्स
 
 
अनुवाद
जो कोई विश्वरूप के संन्यास ग्रहण करने की लीलाओं को सुनता है, उसे भगवान कृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है और वह सकाम कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
 
Whoever listens to the pastimes of Vishwaroopa taking sannyasa, attains devotion to Lord Krishna and becomes free from the bondage of fruitive action.
तात्पर्य
श्री विश्वरूप प्रभु संकर्षण हैं और इसलिए श्री नित्यानंद स्वरूप से भिन्न नहीं हैं। महा-वैकुंठ में मूल-संकर्षण श्री बलदेव-नित्यानंद प्रभु का प्रकाश विस्तार गौर-लीला में विश्वरूप के रूप में प्रकट हुआ है।

यदि कोई विश्वरूप के संन्यास ग्रहण करने के मनोरंजन को सुनता है, तो वह कर्मफलकारी गतिविधियों के बंधन से मुक्ति प्राप्त करेगा। श्री विश्वरूप के तीन विस्तार हैं - पहला पुरुष अवतार, कारणोदकशायी विष्णु, दूसरा पुरुष अवतार, गर्भोदकशायी विष्णु और तीसरा पुरुष अवतार, क्षीरोदकशायी विष्णु। यदि कोई जीवित व्यक्ति इन तीन विष्णु रूपों को सत्यता से समझता है, तो वह जीवन की भौतिक अवधारणा से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)