श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.7.88 
যে-তে-মতে ধৈর্য ধরে মিশ্র-মহাশয
বিশ্বরূপ-গুণ স্মরি’ ধৈর্য পাসরয
ये-ते-मते धैर्य धरे मिश्र-महाशय
विश्वरूप-गुण स्मरि’ धैर्य पासरय
 
 
अनुवाद
यदि किसी प्रकार वह अपना धैर्य पुनः प्राप्त कर लेता, तो जैसे ही उसे विश्वरूप के गुणों का स्मरण होता, वह पुनः अपना धैर्य खो देता।
 
If somehow he regained his composure, he would again lose it as soon as he remembered the qualities of the Universal Form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)