जगन्नाथ मिश्र और शचीदेवी दोनों ही हृदय विदारक थे और निरंतर चिल्ला रहे थे, “विश्वरूप! विश्वरूप!” श्री मिश्र अपने पुत्र के लिए विलाप से अभिभूत थे, इसलिए उनके सभी मित्रों और रिश्तेदारों ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया।
Both Jagannatha Mishra and Shachidevi were heartbroken and cried out incessantly, "Vishvarupa! Vishvarupa!" Mr. Mishra was overwhelmed with grief for his son, so all his friends and relatives tried to calm him down.
तात्पर्य
जगन्नाथ मिश्र ने अपने पुत्र के लिए सामान्य पिता के लिए अपने पुत्र के विलाप के कारण पीड़ा प्रदर्शन वास्तव में उन व्यक्तियों को धोखा देने के लिए था जो अपने पुत्रों जैसी भौतिक वस्तुओं से घबराए हुए हैं। श्री विश्वरूप की संन्यास स्वीकार करने और कृष्ण की पूजा करने में संलग्नता की महिमा ने दैव-वर्णाश्रम संन्यासियों की प्रतिष्ठा को बढ़ाया, जो भौतिक भोग से पैदा हुए विलाप को नष्ट कर देते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥