श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.7.68 
না ভায সṁসার-সুখ বিশ্বরূপ-মনে
নিরবধি থাকে কৃষ্ণ-আনন্দ-কীর্তনে
ना भाय सꣳसार-सुख विश्वरूप-मने
निरवधि थाके कृष्ण-आनन्द-कीर्तने
 
 
अनुवाद
विश्वरूप के मन में कभी भी भौतिक भोगों की इच्छा नहीं हुई। वे निरंतर कृष्ण के नाम-जप के आनंद में लीन रहते थे।
 
Visvarupa never desired material pleasures. He was constantly absorbed in the bliss of chanting Krishna's name.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)