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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण
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श्लोक 67
श्लोक
1.7.67
নাম-মাত্র বিশ্বরূপ চলিলেন ঘরে
পুনঃ আইলেন শীঘ্র অদ্বৈত-মন্দিরে
नाम-मात्र विश्वरूप चलिलेन घरे
पुनः आइलेन शीघ्र अद्वैत-मन्दिरे
अनुवाद
विश्वरूप केवल औपचारिकतावश घर लौट आये, फिर यथाशीघ्र वे अद्वैत के घर लौट आये।
Vishwarupa returned home only as a formality, then as soon as possible he returned to Advaita's house.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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