श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  1.7.59-60 
সহজে শর্করা মিষ্ট,—সর্ব-জনে জানে
কেহ তিক্ত বাসে, জিহ্বা-দোষের কারণে
জিহ্বার সে দোষ, শর্করার দোষ নাই
অতএব সর্ব-মিষ্ট চৈতন্য গোসাঞি
सहजे शर्करा मिष्ट,—सर्व-जने जाने
केह तिक्त वासे, जिह्वा-दोषेर कारणे
जिह्वार से दोष, शर्करार दोष नाइ
अतएव सर्व-मिष्ट चैतन्य गोसाञि
 
 
अनुवाद
सभी जानते हैं कि चीनी स्वभाव से मीठी होती है, लेकिन अगर जीभ रोगग्रस्त हो, तो चीनी कड़वी लगेगी। यह जीभ का दोष है, चीनी का नहीं। निष्कर्ष यह है कि भगवान चैतन्य सबसे मधुर हैं।
 
Everyone knows that sugar is naturally sweet, but if the tongue is diseased, the sugar will taste bitter. This is the fault of the tongue, not of the sugar. The conclusion is that Lord Chaitanya is the sweetest.
तात्पर्य
यद्यपि शर्करा रोग से पीड़ित जिह्वा को मीठी शर्करा कड़वी लगती है, पर शर्करा के मीठेपन में कड़वाहट नहीं होती। उसी प्रकार श्री चैतन्यदेव में जो सम्पूर्ण शिव का आधार है, प्रेम की थोड़ी भी कमी नहीं हो सकती है। जो लोग श्री चैतन्यदेव को अपना आराध्य नहीं समझ पाते हैं, वे अपने अपराध के कारण ऐसी स्थिति में होते हैं। कर्ता होने की स्थिति में श्री चैतन्यदेव साक्षात कृष्ण हैं; पर बद्ध जीवात्मा की भौतिक दृष्टि दोष और अज्ञान से संक्रमित होने के कारण श्री चैतन्यदेव को वे एक साधारण जीव ही समझते हैं, जिनमें अणु चेतना हो, जबकि वस्तुतः वे विभु चेतना, परम चेतना हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)