শ্রী-শুক কহেন,—“শুন, রাজা পরীক্ষিত্
পরমাত্মা—সর্ব-দেহে বল্লভ, বিদিত
আত্মা বিনে পুত্র বা কলত্র বন্ধু-গণ
গৃহ হৈতে বাহির করায তত-ক্ষণ
অতএব, পরমাত্মা-সবার জীবন
সেই পরমাত্মা—এই শ্রী-নন্দনন্দন
অতএব পরমাত্মা-স্বভাব-কারণে
কৃষ্ণেতে অধিক স্নেহ করে গোপী-গণে
श्री-शुक कहेन,—“शुन, राजा परीक्षित्
परमात्मा—सर्व-देहे वल्लभ, विदित
आत्मा विने पुत्र वा कलत्र बन्धु-गण
गृह हैते बाहिर कराय तत-क्षण
अतएव, परमात्मा-सबार जीवन
सेइ परमात्मा—एइ श्री-नन्दनन्दन
अतएव परमात्मा-स्वभाव-कारणे
कृष्णेते अधिक स्नेह करे गोपी-गणे
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया, "हे महाराज परीक्षित, यह सर्वविदित है कि परमात्मा सभी को प्रिय है। जब आत्मा पुत्र, पत्नी या मित्र को छोड़ देती है, तो उसका शरीर घर से बाहर ले जाया जाता है। अतः परमात्मा ही सबका जीवन है। वह परमात्मा नंद महाराज का पुत्र है। अतः गोपियाँ भगवान कृष्ण के प्रति उनके स्वाभाविक परमात्मा स्वरूप के कारण अधिक स्नेह रखती हैं।"
Sukadeva Gosvami replied, "O Maharaja Parikshit, it is well known that the Supreme Soul is dear to everyone. When the soul leaves the son, wife, or friend, its body is taken out of the home. Therefore, the Supreme Soul is the life of everyone. That Supreme Soul is the son of Nanda Maharaja. Therefore, the gopis have greater affection for Lord Krishna because of His inherent Supreme Personality of Godhead."
तात्पर्य
शुद्ध-द्वैत (शुद्ध द्वैतवाद) के अनुयायी, अपने सायुज्य मुक्ति, या ब्रह्म में लीन होने के वर्णन में यह स्वीकार करते हैं कि आत्मा और परमात्मा एक साथ रहते हैं। वेदों में द्वा सुपर्णा पद से यह समझा जाता है कि आत्मा और परमात्मा दोनों एक पात्र में विद्यमान रहते हैं। जैसे ही एक आत्मा परमात्मा की सेवा से वंचित रह जाता है, वह भौतिक कल्पनाओं का विकास करता है। हालांकि आत्मा और परमात्मा दोनों इस संसार में उपस्थित रहते हैं, जो प्रभु की आध्यात्मिक शक्ति द्वारा प्रकट हुआ है, फिर भी उनके बीच एक अंतर बना हुआ है। फिर भी इस अंतर में घृणित या हीन कुछ भी नहीं है। निरपेक्ष सत्य की एकता को स्थापित करने हेतु, इस अद्वैत तत्व को शुद्ध-द्वैत (शुद्ध द्वैतवाद), विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट अद्वैतवाद), शुद्धाद्वैत (शुद्ध अद्वैतवाद) और द्वैताद्वैत (अद्वैत और द्वैतवाद) जैसी विभिन्न शिक्षाओं के तहत समझाया गया है। अपने सहयोगियों के साथ प्रभु के लीलाएं अद्वैत निरपेक्ष सत्य की आध्यात्मिक विविधता की पुष्टि करते हैं। भौतिक विविधता की हीनता, अवैध रूप से और अनुचित रूप से, निराकारवादियों के विचार प्रवाह पर हमला करती रही है। निरपेक्ष सत्य का सेवक जो व्यक्तिवाद के निष्कर्ष में निपुण है, ब्रह्म-सूत्रों पर उपर्युक्त सभी शुद्ध निष्कर्षों में अचिंत्य-भेदाभेद दर्शन में एक अद्भुत और उचित संतुलन पाता है। प्रभु के सहयोगियों की संवैधानिक स्थिति में, श्री नंदनंदन, परमात्मा की सेवा के अलावा कोई अन्य उद्देश्य नहीं है। दूसरे शब्दों में, इस भौतिक दुनिया में विषयों और वस्तुओं के बीच की खामियों और विभेदों में पाए जाने वाले द्वैत का घृणित सांसारिक विचार, वैकुंठ के अद्वैत राज्य में समान रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता। परमात्मा और आत्मा एक-दूसरे से शुभचिंतकों के रूप में संबंधित हैं। जैसे ही जीव उस रिश्ते को भूल जाता है, माया तुरंत उसके लिए इस भौतिक दुनिया में पत्नी और बच्चों जैसे विभिन्न अस्थायी संबंधों की व्यवस्था करती है। परमात्मा की भ्रामक बाहरी ऊर्जा के दो कार्य हैं - ढँकना और फेंकना। जब जीव इस भौतिक दुनिया में उलझ जाता है, तो वह प्रकृति के भौतिक गुणों के नियंत्रण में आ जाता है और अपनी गलतफहमियों के कारण पत्नी और बच्चों से शुरू होकर विभिन्न इंद्रिय विषयों को स्वीकार कर लेता है। इस तरह वह निरपेक्ष सत्य, व्रजेन्द्र-नंदन की सेवा से अलग हो जाता है। कृष्ण की इस गलतफहमी और विस्मृति से, जीव "मैं अपनी पत्नी और बच्चों की तरह सभी भौतिक रसों और रूपों का आनंद लेने वाला हूं" की मानसिकता विकसित करता है। यह जीव का संवैधानिक कर्तव्य नहीं है; यह केवल एक मानसिक कल्पना है। दूसरे शब्दों में, जीव को माया की आवरण और प्रक्षेपण शक्तियों द्वारा पदनाम दिए जाते हैं और वह उन पदनामों के संबंधित परिणामों का आनंद लेता है। लेकिन भौतिक कल्पनाएं कभी भी एक शुद्ध जीव को छू नहीं पाती हैं। जीव का शाश्वत प्रवृत्ति कृष्ण चेतना को विकसित करना है। एक जीव अपने भौतिक पदनामों को स्वयं के रूप में स्वीकार करता है, जो भक्तिहीन गलतफहमियों के कारण होता है। ऐसी गलतफहमियों के प्रभाव में बद्ध आत्माएं निराकारवादी, या निराकार समरूप ब्रह्म के उपासक बन जाते हैं, जबकि कुछ भौतिक भोग के प्रति अपनी तीव्र इच्छा के कारण स्वर्ग या नरक का आनंद लेने के इच्छुक होते हैं। जब एक भौतिक पदनामों और विलक्षण बुद्धि वाला शुद्ध जीव मायावादी बन जाता है, तो वह आध्यात्मिक और भौतिक एकता की झूठी अवधारणा से ढक जाता है, जो जीवों और ब्रह्म के बीच एकता और भौतिक प्रकृति और ब्रह्म के बीच एकता की कल्पनाशील विचारों का एक बवंडर पैदा करता है। जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वह तुरंत समझ जाती है, "मैं शरीर नहीं हूँ। अगर मैं शरीर होता, तो मेरे रिश्तेदार मेरे शरीर के पांच तत्वों को मेरे अंतिम संस्कार के समय प्रकृति के पांच तत्वों में क्यों लौटाने का प्रयास करते। चूंकि मैं भौतिक शरीर से अलग हूँ, इसलिए मेरे शरीर को छोड़ने के बाद इससे संबंधित लोग इसे घृणित मानते हैं और इसे घर से बाहर निकालना चाहते हैं।
हालांकि जड़ जगत्, जिसकी स्रष्टि परमात्मा की बाह्य शक्ति ने की है, मिथ्या नहीं है, फिर भी शाश्वत भी नहीं है, अर्थात, वह परिवर्तनशील है। शाश्वत आत्मा और अस्थायी मन दोनों अहंकारी चेतना रखते हैं, फिर भी दोनों में अंतर है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥