फिर भी, इस रहस्य का खुलासा श्रीमद्भागवत में शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को किया था। अब कृपया इस संबंध में श्रीमद्भागवत में शुकदेव और परीक्षित के बीच हुई अद्वितीय चर्चा सुनें।
Nevertheless, this secret was revealed by Shukadeva Goswami to Maharaja Parikshit in the Srimad Bhagavatam. Now, please listen to the unique discussion between Shukadeva and Parikshit in the Srimad Bhagavatam regarding this.
तात्पर्य
श्रीमद भागवतम् (10.14.49) में ऐसा कहा गया है: "राजा परीक्षित ने कहा: हे ब्राह्मण, गोपियों ने कृष्ण, किसी और के बेटे के लिए, किस तरह ऐसा अभूतपूर्व प्रेम विकसित किया, ऐसा प्रेम जो उन्होंने अपने बच्चों के लिए भी कभी महसूस नहीं किया? कृपया इसे समझाएँ।" श्री शुकादेव गोस्वामी ने श्लोक 50-57 में उत्तर दिया: "श्री शुकादेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा, हर सृजित प्राणी के लिए सबसे प्रिय चीज़ निश्चित रूप से उसका अपना स्वयं है। अन्य सभी चीजों की प्रियता - बच्चे, धन इत्यादि - केवल आत्मा की प्रियता के कारण है। इसी कारण से, हे राजाओं में श्रेष्ठ, अध्यात्म एकाग्रचित्त होता है: वह अपने स्वयं के शरीर और आत्म से अधिक अपने तथाकथित अधिकारों जैसे बच्चे, धन और घर से जुड़ा होता है। निश्चित रूप से, उन लोगों के लिए जो शरीर को आत्मा समझते हैं, हे राजाओं में श्रेष्ठ, वे चीजें जिनका महत्व केवल शरीर के साथ उनके संबंध में है, कभी भी स्वयं शरीर जितनी प्रिय नहीं होती हैं। यदि कोई व्यक्ति शरीर को "मुझे" के बजाय "मेरा" समझने की स्थिति में आता है, तो वह निश्चित रूप से शरीर को अपने आत्म जितना प्रिय नहीं समझता है। आख़िरकार, जब शरीर बूढ़ा और बेकार होता जा रहा है, तब भी जीने की इच्छा प्रबल बनी रहती है। इसलिए प्रत्येक अध्यात्म के लिए उसका अपना आत्म ही सबसे प्रिय है, और बस इस आत्म की संतुष्टि के लिए ही चल और अचल संस्थाओं की पूरी भौतिक सृष्टि अस्तित्व में है। आपको कृष्ण को सभी जीवों की मूल आत्मा के रूप में जानना चाहिए। पूरे ब्रह्मांड के लाभ के लिए, उन्होंने अपनी अकारण दया से, एक सामान्य मानव के रूप में अवतार लिया है। उन्होंने अपनी आंतरिक क्षमता के बल पर ऐसा किया है। इस दुनिया में जो लोग भगवान कृष्ण को वैसे ही समझते हैं जैसे वे हैं, वे सभी चीज़ों को, स्थिर या गतिमान, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रकट रूपों के रूप में देखते हैं। ऐसे प्रबुद्ध व्यक्ति भगवान कृष्ण से अलग कोई वास्तविकता नहीं पहचानते हैं। भौतिक प्रकृति का मूल, अप्रकट रूप सभी भौतिक चीज़ों का स्रोत है, और उस सूक्ष्म भौतिक प्रकृति का स्रोत भी भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण है। फिर, उसे उससे अलग क्या माना जा सकता है? "इन श्लोकों और लेखक [वृंदावन दास ठाकुर] के अनुवाद को निम्नलिखित श्लोकों में उद्धृत किया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥