श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.7.43 
প্রভু দেখি’ ভক্ত-মোহ স্বভাবেই হয
বিনা অনুভবেও দাসের চিত্ত লয
प्रभु देखि’ भक्त-मोह स्वभावेइ हय
विना अनुभवेओ दासेर चित्त लय
 
 
अनुवाद
भक्तगण स्वभावतः अपने भगवान को देखकर अभिभूत हो जाते हैं; वास्तव में, भक्तों को भगवान की पहचान का एहसास होने से पहले ही भगवान ने उनके हृदय चुरा लिए थे।
 
Devotees are naturally overwhelmed by the sight of their Lord; in fact, the Lord has already stolen their hearts before the devotees realize His identity.
तात्पर्य
हालांकि शुद्ध जीवधारियों और बाध्य जीवधारियों दोनों में भगवान के प्रति निष्ठा स्वाभाविक रूप से ही होती है, लेकिन पहले वाले की चेतना जागृत हो चुकी है जिसकी वजह से वे अपने अनंतपूज्य सच्चिदानंद भगवान विष्णु के प्रति प्रेम का एहसास कर सकते हैं, जबकि बाद वालों पर माया का नियंत्रण है और वे ऐसा नहीं कर सकते। जब बाध्यकारी अवस्था पार हो जाती है या जब सभी अनर्थों का विनाश हो जाता है, भगवान विष्णु की सेवा के आश्रय में एक जीवधारी इस भौतिक जगत में निवास करते हुए भी विशुद्ध रह सकता है। उस वक्त उन्हें महाभागवत के तौर पर जाना जाता है। मध्यमाभागवत महाभागवत का एक शुद्ध सेवक है। कनिष्ठ भागवत जब तक मध्यमाभागवत के स्तर पर नहीं पहुँचता, वह उसका सेवक ही बना रहता है फिर चाहे वह चाहे महाभागवत की सेवा कर रहा हो। कनिष्ठ भागवत चूँकि अपनी आध्यात्मिक उन्नति चाहता है और वैकुंठ के लिए अनंत अपूर्ण मार्ग पर चल रहा है, इसलिए वह भौतिक सुख और मोक्ष की चाहत रखने वाले बाध्यकारी प्राणियों से श्रेष्ठ है। लेकिन उसका विश्वास सिर्फ विष्णु में ही है कि वे ही पूर्ण पारलौकिक सत्य हैं और इस बोध के कारण उसे कनिष्ठाधिकारी के रूप में जाना जाता है। जब कोई कनिष्ठाधिकार प्राप्त करता है, वह समझ पाता है कि उसका आध्यात्मिक गुरु मध्यमाधिकारी के रूप में विराजमान है। लेकिन जब वह मध्यमाधिकार को प्राप्त करता है, तो वह अपने आध्यात्मिक गुरु को महाभागवत के तौर पर स्वीकार कर सकता है और खुद एक शुद्ध भक्त बनने के लिए खुद को योग्य बना सकता है। महाभागवतों का कोई भी काम भगवान हरि और उनके भक्तों की सेवा करने के अलावा नहीं होता। कृष्ण से असंबंधित चीज़ों से जुड़े होने की वजह से साधारण बाध्यकारी जीव अपनी अशुद्ध बुद्धि की वजह से बाहरी दुनिया की सेवा में लगे रहते हैं। जब ऐसे लोग कनिष्ठाधिकार के स्तर पर आते हैं, तो वे अपनी गतिविधियों के नतीजों को भगवान के साथ जोड़ते हैं और इस तरह मिश्रित भक्ति सेवा की उपासना करते हैं। जीवधारियों के अनंत स्वरूप में एक अनंत प्रवृत्ति होती है जिसे हरि-भक्ति कहते हैं। जिस तरह से एक मूर्ख बाध्यकारी जीव भौतिक चीजों की तरफ आकर्षित होता है, उसी तरह शुद्ध जीवधारी जो भक्ति सेवा में स्थित होता है और जिसका स्वाभाविक झुकाव होता है, वो भी उसी तरह भगवान की तरफ आकर्षित होता है। कुछ दुर्भाग्यशाली लोगों के अनुसार, ''यहाँ तक कि भक्ति सेवा भी, जो जीवधारियों की अनंत प्रवृत्ति है, एक संसारिक, विकृत, भयानक, भ्रामक प्रवृत्ति है।'' जो लोग बहस करते हैं या मूर्ख व्यक्ति जो भौतिक विचारों में निपुण हैं, भक्ति सेवा के शुद्ध रूप को समझ नहीं पाते हैं, जो ज्ञान और आनंद से भरा हुआ है और जो मुक्त, स्वयं से संतुष्ट, हंस जैसी हस्तियों का लक्ष्य है; बल्कि वे भक्ति सेवा को स्वीकार करते हैं, जो जीवधारियों की एक अनंत रूप से पूर्ण पारलौकिक प्रवृत्ति है, एक मानसिक पाकक्रिया के तौर पर। इस गलतफहमी के कारण साधारण लोग विद्वान विद्वानों की कलगी कहे जाने वाले शुकदेव गोस्वामी के कृष्ण के प्रति अनंत आकर्षण को भौतिक भ्रम या मोह के तौर पर लेते हैं। भगवान की सेवा करने से मिलने वाले पारलौकिक सुख को ध्यान में रखते हुए, लेखक ने इस तरह मोह शब्द का इस्तेमाल किया है जिससे आम लोगों को समझने में आसानी हो सके। कृष्ण के अनंत सेवकों के लिए प्रेम और उमंग के साथ कृष्ण की सेवा करना स्वाभाविक है। दूसरे शब्दों में कहें, जीवधारी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के तौर पर अपनी मूल स्थिति में रहते हुए हमेशा कृष्ण की आराधना करता है। भोगविलास के भाव वाले बाध्यकारी जीव इस भौतिक जगत में कृष्ण के प्रेम को समझ नहीं सकते हैं, लेकिन कृष्ण जो स्वयं संतुष्ट आत्माओं को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं, अनजाने में ही अपने सेवकों के हृदयों को आकर्षित करते हैं, जिन्होंने भौतिक भोगविलास का त्याग कर दिया है, जिनकी चेतना जागृत हो चुकी है और जो पूर्ण सत्य के ज्ञाता हैं। इसी को कृष्ण अपने उन सेवकों को अपनी तरफ आकर्षित करना कहते हैं जो शांत-रस के आश्रय में हैं। शांत-रस के आश्रय में रहने वाले सेवक जैसे कि व्रज की गायें, लाठी, सींग और बाँसुरी, हालाँकि दास्य-रस में नहीं स्थित होते, अनजाने ही कृष्ण की सेवा करते हैं जबकि बाहरी रूप से कम बुद्धिमान दिखते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)