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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण
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श्लोक 37
श्लोक
1.7.37
আপন-প্রস্তাব শুনি’ শ্রী-গৌরসুন্দর
সবারে করেন শুভ-দৃষ্টি মনোহর
आपन-प्रस्ताव शुनि’ श्री-गौरसुन्दर
सबारे करेन शुभ-दृष्टि मनोहर
अनुवाद
उनकी स्तुति सुनकर श्री गौरसुन्दर ने उन पर दया दृष्टि डाली।
Hearing his praise, Shri Gaursundar looked upon him with pity.
तात्पर्य
आपन-प्रस्ताव वाक्यांश का अर्थ है "अपने स्वयं के गौरव के विषय में"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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