श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.7.31 
পূজা ছাডি’ বিশ্বরূপে ধরি’ করি কোলে
আনন্দে বৈষ্ণব সব ’হরি হরি’ বোলে
पूजा छाडि’ विश्वरूपे धरि’ करि कोले
आनन्दे वैष्णव सब ’हरि हरि’ बोले
 
 
अनुवाद
अद्वैत ने अपने विग्रह की पूजा छोड़कर विश्वरूप को गले लगा लिया और सभी वैष्णवों ने प्रसन्नतापूर्वक “हरि! हरि!” का जाप किया।
 
Advaita gave up worshipping his own Deity and embraced the Vishvarupa, and all the Vaishnavas joyfully chanted "Hari! Hari!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)