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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण
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श्लोक 28
श्लोक
1.7.28
দুঃখে বিশ্বরূপ-প্রভু মনে মনে গণে
“না দেখিব লোক-মুখ, চলি’ যাঙা বনে”
दुःखे विश्वरूप-प्रभु मने मने गणे
“ना देखिब लोक-मुख, चलि’ याङा वने”
अनुवाद
ऐसे दुःख में विश्वरूप ने सोचा, “मैं इन भौतिकवादी लोगों का मुख नहीं देखूंगा, बल्कि मैं वन में चला जाऊंगा।”
In such sorrow, Vishwarupa thought, “I will not see the faces of these materialistic people, rather I will go to the forest.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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