श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.7.18 
আর্যা-তরজা পঢে সব বৈষ্ণব দেখিযা
“যতি, সতী, তপস্বীও যাইবে মরিযা
आर्या-तरजा पढे सब वैष्णव देखिया
“यति, सती, तपस्वीओ याइबे मरिया
 
 
अनुवाद
वे किसी वैष्णव को देखते ही ईशनिंदा भरे गीत रचकर सुनाते थे। वे चुनौती देते थे, "संन्यासी, पतिव्रता या तपस्वी होने का क्या फ़ायदा? उन्हें भी मरना होगा।"
 
Whenever he saw a Vaishnava, he would compose and recite blasphemous songs. He would challenge, "What's the use of being a sanyasi, a chaste woman, or an ascetic? They too must die."
तात्पर्य
आर्य-तराज के पद में आर्य शब्द किसी विशेष घटना या व्‍यक्ति के बारे में रची गई बंगाली कविता को संदर्भित करता है। तराज शब्द एक अरबी शब्द है और यह संगीत प्रदर्शन या हल्‍के गानों में दो पक्षों के बीच प्रश्‍न-उत्‍तर के रूप में आदान-प्रदान की गई अपमानजनक कविताओं को संदर्भित करता है।

उस समय नवद्वीप के नास्तिक निवासी चार्वाक मुनि के सिद्धांत का पालन करते थे और इस प्रकार अपने शरीर के साथ झूठी पहचान के कारण भोग-विलास के कारण पागल हो गए थे। जब भी वे शुद्ध वैष्‍णवों को देखते थे तो वे उन्‍हें चिढ़ाते थे और कविताएँ बनाते थे। उन्‍होंने यहां तक कहा था कि संन्‍यासियों, पवित्र महिलाओं और तपस्‍वियों द्वारा धार्मिक कर्तव्‍यों का पालन बेकार है, क्‍योंकि बहुत अधिक धर्म अर्जित करने के बावजूद वे खुद को मृत्‍यु से नहीं बचा सकते। तो ऐसे धार्मिक कर्तव्‍यों का पालन करने की कोई जरूरत नहीं थी। दूसरे शब्‍दों में, वे ऐसे लोगों को दुर्भाग्‍यपूर्ण दुष्‍ट व्यक्ति मानते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)