उस समय नवद्वीप के नास्तिक निवासी चार्वाक मुनि के सिद्धांत का पालन करते थे और इस प्रकार अपने शरीर के साथ झूठी पहचान के कारण भोग-विलास के कारण पागल हो गए थे। जब भी वे शुद्ध वैष्णवों को देखते थे तो वे उन्हें चिढ़ाते थे और कविताएँ बनाते थे। उन्होंने यहां तक कहा था कि संन्यासियों, पवित्र महिलाओं और तपस्वियों द्वारा धार्मिक कर्तव्यों का पालन बेकार है, क्योंकि बहुत अधिक धर्म अर्जित करने के बावजूद वे खुद को मृत्यु से नहीं बचा सकते। तो ऐसे धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने की कोई जरूरत नहीं थी। दूसरे शब्दों में, वे ऐसे लोगों को दुर्भाग्यपूर्ण दुष्ट व्यक्ति मानते थे।
