श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  1.7.173 
প্রভু বোলে,—“মাতা, তুমি বড শিশু-মতি!
অপবিত্র স্থানে কভু মোর নহে স্থিতি
प्रभु बोले,—“माता, तुमि बड शिशु-मति!
अपवित्र स्थाने कभु मोर नहे स्थिति
 
 
अनुवाद
प्रभु ने उत्तर दिया, "मेरी प्यारी माँ, तुम बहुत बचकानी हो। मैं कभी भी अशुद्ध स्थान पर नहीं रहता।
 
The Lord replied, “My dear mother, you are very childish. I never stay in an unclean place.
तात्पर्य
हिंदी-टेक्स्ट: जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (अंत्य 4.176) में कहा गया है: "द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब—'मनोधारण' 'ए भाला, ए मंड',—ए सब 'भ्रम'" भौतिक दुनिया में अच्छे और बुरे की धारणाए सभी मानसिक अटकलें है। इसलिए, यह कहना कि, 'यह अच्छा है, और यह बुरा है, 'सब भ्रम है"। और श्रीमद भागवतम में (11.28.4) कहा गया है: "किम् भद्रम् किम् अभद्रम् वा द्वैतस्यावस्तु न: कियत् वाचोदितम् तद् अनृतम् मनसा 'ध्यातम एव च " कृष्ण के संबंध में कुछ भी कल्पना नहीं की जानी चाहिए, इसे भ्रम [माया] समझना चाहिए। शब्दों द्वारा या मन में कल्पित कोई भी भ्रम तथ्यात्मक नहीं है। क्योंकि भ्रम तथ्यात्मक नहीं है, इसलिए जो हम सोचते है कि अच्छा है और हम सोचते हैं कि बुरा है, उसमे कोई भेद नहीं है। जब हम परम सत्य को बोलते है, तो ऐसी अटकलें लागू नहीं होती हैं। शुद्धता और अशुद्धता के विचार जो संलग्न गृहस्थों द्वारा स्वीकार किए जाते हैं जो गैर भक्तिवादी भौतिकवादी स्मार्टो के सिद्धांत का पालन करते हैं, उन्हें वैष्णव स्मृतियों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है। वैष्णव स्मृतियों के अनुसार, भगवान की खुशी के लिए दी जाने वाली सेवा और सेवा की सामग्री को कभी अप्रिय, विपरीत या अशुद्ध नहीं माना जा सकता है। वैष्णव स्मृतियों में पाई जाने वाली और श्री गौरसुंदर द्वारा प्रस्तावित यह शुद्ध विचार सांसारिक इंद्रिय ज्ञान से उन्मेषित स्मार्टो के भौतिक नियमों और विनियमों में तबाही मचा दी है। पद्म पुराण में कहा गया है: "नैवेद्यम् जगदीशस्य अन्न-पानी आदि क च यत् ब्रह्मवन-निरविकार हि यथा विष्णु तथाईव तत" वो खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थ जो कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं वे पारलौकिक, अविनाशी हैं, और विष्णु से भिन्न नहीं हैं। जो खाद्य पदार्थ विष्णु को अर्पण किए जा सकते हैं उन्हें नैवेद्य कहा जाता है। घृणित वस्तुएं कभी भी विष्णु-नैवेद्य नहीं हो सकती है। वैष्णव स्मृति के अनुसार एक वैष्णव को कभी सांसारिक शुद्धता और अशुद्धता में भेद नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे विष्णु के संबंध में सब कुछ देखना चाहिए। शुद्ध वैष्णव स्वाभाविक रूप से मुक्त व्यक्तियों के आध्यात्मिक सिद्धांतों की ओर झुकाव रखते है और उनकी सामान्य सांसारिक दृष्टि नहीं होती है। इस संबंध में शास्त्रों के निम्नलिखित कथनों पर चर्चा की जा सकती है। "सुरर्षे विहिता शास्त्रे हरिम उद्दिश्य याक्रिया सैव भक्ति इति प्रोक्ता याया भक्ति परा भवेत" "हे नारद, हे देवताओं के बीच के ऋषि, भगवान हरि, भगवान विष्णु को संतुष्ट करने के लिए प्रकट शास्त्रों में निर्धारित वे क्रियाएँ, भक्ति के नियमित सिद्धांत कहलाते हैं, (साधना-भक्ति), जिसके अभ्यास से कोई सर्वोच्च भक्ति (प्रेम) प्राप्त कर सकता है। "लौकिकी वैदिकी वा पि याक्रिया क्रियते मुने हरि-सेवानुकूलाईव सा कार्य भक्तिम् इछता" "एक को केवल वे ही क्रियाएँ करनी चाहिए - या तो सांसारिक या वैदिक नियमों और विनियमों द्वारा निर्धारित की गई - जो कृष्ण भावना की खेती के लिए अनुकूल हैं। "इहा यस्य हरर दास्ये कर्मणा मनसा गिर निकिल स्व अपि अवस्थासु जीवन-मुक्तः स उच्यते" "जो व्यक्ति कृष्ण की सेवा में अपने शरीर, मन, बुद्धि और शब्दों से कार्य करता है, वह भौतिक दुनिया में भी मुक्त व्यक्ति होता है।" वैष्णव साहित्य में पाई जाने वाली शुद्धता और अशुद्धता का विचार स्मार्टो से अलग है। भौतिक विचारों को त्यागने के बाद किसी व्यक्ति की शुद्धता और श्रेष्ठता परम पूर्ण सत्य की सेवा के प्रति उसके झुकाव पर निर्भर करती है। (यह 173-179 श्लोकों का भाव है।)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)