श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  1.7.170 
মুর্খ আমি, না জানিযে ভাল-মন্দ-স্থান
সর্বত্র আমার ’এক’ অদ্বিতীয-জ্ঞান”
मुर्ख आमि, ना जानिये भाल-मन्द-स्थान
सर्वत्र आमार ’एक’ अद्वितीय-ज्ञान”
 
 
अनुवाद
"मैं मूर्ख हूँ, इसलिए मुझे नहीं पता कि कौन सी जगह अच्छी है और कौन सी बुरी। इसलिए मैं सभी जगहों को बराबर मानता हूँ।"
 
"I'm stupid, so I don't know which place is good and which is bad. That's why I consider all places equal."
तात्पर्य
अद्वितीय-ज्ञान शब्द का अर्थ सभी स्थानों की समानता की अनुभूति का बोध है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)