श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  1.7.165 
লাগিল হাঙ্ডীর কালি সর্ব-গৌর-অঙ্গে
কনক-পুতলি যেন লেপিযাছে গন্ধে
लागिल हाङ्डीर कालि सर्व-गौर-अङ्गे
कनक-पुतलि येन लेपियाछे गन्धे
 
 
अनुवाद
उन कलशों की काली कालिख गौरा के अंगों पर लग गई और वह अगुरु मिश्रित चंदन से लिपटी हुई स्वर्णिम गुड़िया के समान प्रतीत होने लगी।
 
The black soot from those pots got stuck on Gaura's body and she started looking like a golden doll wrapped in sandalwood paste mixed with aguru.
तात्पर्य
मृण्‍मय पाक पात्रों से काजल की लीप लगी हुई निमाई की सुवर्णमयी देह सुनहरी गुड़िया के अंगों पर काले अगर और चंदन का लेप लगाए से भाँति प्रतीत होती थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)