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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 1: आदि-खण्ड
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अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण
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श्लोक 136
श्लोक
1.7.136
অনাযাসেন মরণṁ বিনা দৈন্যেন জীবনম্
অনারাধিত গোবিন্দ- চরণস্য কথṁ ভবেত্
अनायासेन मरणꣳ विना दैन्येन जीवनम्
अनाराधित गोविन्द- चरणस्य कथꣳ भवेत्
अनुवाद
"जिसने कभी भगवान गोविंद के चरण कमलों की पूजा नहीं की, उसके लिए सुखपूर्वक रहना और शांति से मरना कैसे संभव है?"
"How is it possible for one who has never worshipped the lotus feet of Lord Govinda to live happily and die peacefully?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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