কদাচিত্ যাহা না পায শুক বা প্রহ্লাদ
তোমা’ সবার ভৃত্যেও পাইবে সে প্রসাদ”
कदाचित् याहा ना पाय शुक वा प्रह्लाद
तोमा’ सबार भृत्येओ पाइबे से प्रसाद”
अनुवाद
“आप सभी भक्तों को ऐसी कृपा प्राप्त होगी जो श्रील शुकदेव गोस्वामी और प्रह्लाद महाराज को भी नहीं मिली।”
“All of you devotees will receive such grace which even Srila Sukadeva Goswami and Prahlada Maharaja did not receive.”
तात्पर्य
कृष्ण की विशुद्ध सेवा में कोई मिश्रित या अलग रुचि नहीं होती। यद्यपि परम सत्य श्री कृष्ण की विशेषताएं और उनके आनंद के तत्व गुणात्मक रूप से एक हैं, उनकी विविध ऊर्जाएँ विभिन्न प्रकार के लीलाओं को प्रकट करती हैं। शुद्ध-द्वैत (परिशुद्ध द्वैतवाद), शुद्धाद्वैत (परिशुद्ध अद्वैतवाद), द्वैताद्वैत (अद्वैतवाद और द्वैतवाद), और विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट अद्वैतवाद) के दर्शनों में कृष्ण की पूजा पर मुख्य रूप से बल दिया जाता है। ऐसा अद्वैत विचार भी श्री अद्वैत प्रभु ने स्वीकार किया था। श्री चैतन्य-चंद्रामृत (18) में त्रिदंडी स्वामी श्रील प्रबोधानंद ने कहा है: "भगवान गौर के प्रिय भक्तगण विशुद्ध भक्ति सेवा के शानदार मार्ग पर उत्साहपूर्वक लीलाओं का आनंद लेते हैं, जिन्हें व्यासदेव जैसे महान ऋषि भी पूरी तरह से समझ नहीं पाए, जिसमें भौतिक बुद्धि प्रवेश करने में असमर्थ है, जिसे शुकदेव गोस्वामी प्रकट नहीं कर सके, और जिसे दयालु भगवान कृष्ण ने कभी भी अपने भक्तों को प्रकट नहीं किया।" श्रील रूप प्रभु ने अपने उपदेशामृत (11) में इस प्रकार कहा है: यत् प्रेष्ठैरपि अप्यलम असुलभं किं पुनर भक्ति-भाजां - "जो महान भक्तों द्वारा भी बहुत कम प्राप्त किया जाता है, वह साधारण भक्तों के लिए प्राप्त करना और भी कठिन है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥