श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 7: श्री विश्वरूप का संन्यास ग्रहण  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.7.100 
বুঝাইলে কেহ কৃষ্ণ-পথ নাহি লয
উলঢিযা আরো সে উপহাস করয
बुझाइले केह कृष्ण-पथ नाहि लय
उलढिया आरो से उपहास करय
 
 
अनुवाद
"अगर उन्हें सिखाया भी जाए, तो भी वे भक्ति जीवन नहीं अपनाएँगे। इसके विपरीत, वे हमें ताना मारते हुए कहते हैं:
 
"Even if they are taught, they will not adopt a devotional life. On the contrary, they taunt us, saying:
तात्पर्य
भौतिकवादी अस्थायी सांसारिक सुख से उन्मत्त थे। वे परम निरपेक्ष सत्य को समझ नहीं पाए और परिणामस्वरूप, वे उपहासपूर्ण हो गए और हँसे। पर वास्तव में वे अपनी कामुक बुद्धि की ताकत से अधोक्षज कृष्ण की सेवा को समझने में असमर्थ थे। भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा ही एकमात्र आवश्यकता है, इसे समझने के बजाय, ऐसे भौतिकवादी इस संसार और अपने काम के फलों से जुड़ जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)