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श्लोक 1.6.105  |
সে হেন নন্দন যা’র গৃহ-মাঝে থাকে
কি করিতে পারে তা’রে ক্ষুধা-তৃষা-শোকে? |
से हेन नन्दन या’र गृह-माझे थाके
कि करिते पारे ता’रे क्षुधा-तृषा-शोके? |
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| अनुवाद |
| “जिसके घर में ऐसा पुत्र हो, उसे भूख, प्यास या विलाप का अनुभव कैसे हो सकता है? |
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| “How can one who has such a son in his house experience hunger, thirst or lamentation? |
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