श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 5: भिक्षु ब्राह्मण के भोग को ग्रहण करना  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  1.5.138 
পুনঃ পুনঃ মূর্চ্ছা বিপ্র যায ভূমি-তলে
পুনঃ উঠে, পুনঃ পডে মহা-কুতূহলে
पुनः पुनः मूर्च्छा विप्र याय भूमि-तले
पुनः उठे, पुनः पडे महा-कुतूहले
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बार-बार बेहोश होकर जमीन पर गिरता और फिर बड़े हर्ष से उठ खड़ा होता।
 
The Brahmin would repeatedly fall unconscious on the ground and then get up with great joy.
तात्पर्य
महा-कुटूहेल शब्द का अर्थ है "आनंदमय प्रेमिल आदान-प्रदान के कारण"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)