श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 5: भिक्षु ब्राह्मण के भोग को ग्रहण करना  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.5.117 
ঘরে থাকি’ স্ত্রী-গণ বোলেন,—“চিন্তা নাই
নিদ্র গেল, আর কিছু না জানে নিমাই”
घरे थाकि’ स्त्री-गण बोलेन,—“चिन्ता नाइ
निद्र गेल, आर किछु ना जाने निमाइ”
 
 
अनुवाद
कमरे के अंदर से औरतें बोलीं, "चिंता मत करो, निमाई सो रहा है। अब वह कुछ नहीं करेगा।"
 
The women from inside the room said, "Don't worry, Nimai is sleeping. He won't do anything now."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)