जैसे-जैसे सभी को यह महान रहस्य समझ में आने लगा, तो जब भी भगवान पुकारते, वे सभी हरि का नाम जपने लगते।
As everyone began to understand this great secret, they all began to chant the name of Hari whenever the Lord called.
तात्पर्य
सब समझ गए कि जब तक हरि के नाम नहीं लेंगे तब तक भगवान रोते ही रहेंगे और हरि के नाम लेंगे तो भगवान नहीं रोएंगे । इसलिए भगवान के सामने हरि के नाम लेने लगे । बाद में महाप्रभु ने महाभागावत या उन्नत भक्त के लक्षण रामानन्द वासु को इस प्रकार स्पष्ट रूप से समझायेः–
यांहारा दर्शने मुखे आए कृष्ण-नाम
तांहारे जानिहा तुम वैष्णव-प्रधान
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहाः– वह श्रेष्ठ वैष्णव माना जाता है जिसके दर्शन मात्र से दूसरों के मुख से कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥