श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.4.76 
ভক্তি করি’ যে এ-সব বেদ-গোপ্য শুনে
সṁসার-ভুজঙ্গ তারে না করে লঙ্ঘনে
भक्ति करि’ ये ए-सब वेद-गोप्य शुने
सꣳसार-भुजङ्ग तारे ना करे लङ्घने
 
 
अनुवाद
जो कोई भी इन गोपनीय विषयों को भक्तिपूर्वक सुनता है, उसे भवसागर रूपी सर्प कभी नहीं डसता।
 
Whoever listens to these confidential topics with devotion is never bitten by the snake of the ocean of life.
तात्पर्य
संसार-भुजंग शब्द सांसारिक अस्तित्व के सांप को संदर्भित करता है। जब ऐसा सांप किसी जीवित प्राणी को काटता है, तो वह भौतिक सुख के जहर से पीड़ित हो जाता है, जो भौतिक अस्तित्व के लिए उसके लगाव को बढ़ाता है। इस तरह सशर्त जीवित इकाई आनंद के जहर से पीड़ित होता है और खुद को भोक्ता मानता है। फिर वह भौतिक सुख की निरंतर खोज करता है, गौरा-नारायण को भूल जाने के कारण। जो व्यक्ति भगवान गौरा-नारायण को अनंत शेष के बिस्तर पर सोने के शगल पर ठीक से चर्चा करता है, वह कभी भी सर्वोच्च भगवान, जो छह वैभवों से पूर्ण हैं, को कभी भी माया के नियंत्रण वाले सशर्त आत्माओं की तरह नहीं मानता है। ऐसा व्यक्ति खुद को भगवान का एक शाश्वत नौकर मानता है; वह भौतिक भोग की प्यास से आंदोलित नहीं होता है। इस संबंध में कोई भी श्रीमद् भागवतम (10.16.61-62) में मिले ऐसे कथनों को संदर्भित कर सकता है: न युष्मद भयं आप्नुयात- "वह आपसे कभी नहीं डरेगा," और सर्व-पापैः प्रमुच्यते- "वह सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाएगा।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)