श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.4.66 
পরম-নির্ভযে সর্ব-অঙ্গনে বিহরে
কিবা অগ্নি, সর্প, যাহা দেখে, তাই ধরে
परम-निर्भये सर्व-अङ्गने विहरे
किबा अग्नि, सर्प, याहा देखे, ताइ धरे
 
 
अनुवाद
वह निर्भय होकर पूरे प्रांगण में घूमता रहा और जो कुछ भी देखता, चाहे वह आग हो या साँप, उसे पकड़ लेता।
 
He roamed fearlessly throughout the courtyard and caught whatever he saw, be it fire or a snake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)