श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.4.58 
যে দিকে হাসিযা প্রভু চা’ন বিশ্বম্ভর
আনন্দে সিঞ্চিত হয তার কলেবর
ये दिके हासिया प्रभु चा’न विश्वम्भर
आनन्दे सिञ्चित हय तार कलेवर
 
 
अनुवाद
विश्वम्भर की मुस्कुराती हुई दृष्टि जिस पर पड़ती थी, वह प्रसन्नता से भर जाता था।
 
Whoever Vishvambhar's smiling gaze fell on was filled with joy.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)