श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  1.4.128 
আপনার ঘর নহে,—দেখে দুই চোরে
কোথা আসিযাছি, কিছু চিনিতে না পারে
आपनार घर नहे,—देखे दुइ चोरे
कोथा आसियाछि, किछु चिनिते ना पारे
 
 
अनुवाद
चोरों को तब एहसास हुआ कि यह उनका घर नहीं है, लेकिन वे समझ नहीं पाए कि वे कहां हैं।
 
The thieves then realized that it was not their house, but they could not understand where they were.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)