श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  1.4.115 
দুই চোর চলি’ যায নিজ-মর্ম-স্থানে
স্কন্ধের উপরে হাসি’ যা’ন ভগবানে
दुइ चोर चलि’ याय निज-मर्म-स्थाने
स्कन्धेर उपरे हासि’ या’न भगवाने
 
 
अनुवाद
जब दोनों चोर अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे, भगवान चोर के कंधे पर सवार होकर मुस्कुरा रहे थे।
 
As the two thieves were going towards their destination, the Lord was smiling while riding on the thief's shoulder.
तात्पर्य
मर्मस्थान शब्द से आशय उस एकांत सुनसान स्थान से होता है जिसकी चोर लोग कामना करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)