श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  1.4.111 
“ঝাট্ ঘরে আইস, বাপ” বোলে দুই চোরে
হাসিযা বোলেন প্রভু,—“চল যাই ঘরে”
“झाट् घरे आइस, बाप” बोले दुइ चोरे
हासिया बोलेन प्रभु,—“चल याइ घरे”
 
 
अनुवाद
चोरों ने कहा, “आओ, हम घर चलें,” और प्रभु मुस्कुराये और बोले, “हाँ, चलें।”
 
The thieves said, “Come, let us go home,” and the Lord smiled and said, “Yes, let us go.”
तात्पर्य
शब्द “झाट” शब्द “झटिति” का विकृत रूप है, जिसका अर्थ है "तुरंत।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)