श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  1.4.109 
প্রভুর শ্রী-অঙ্গে দেখি’ দিব্য অলঙ্কার
হরিবারে দুই চোরে চিন্তে পরকার
प्रभुर श्री-अङ्गे देखि’ दिव्य अलङ्कार
हरिबारे दुइ चोरे चिन्ते परकार
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि भगवान ने बहुमूल्य आभूषण पहने हुए हैं, और उन्होंने सोचा कि वे उन्हें कैसे चुरा सकते हैं।
 
They saw that the Lord was wearing precious ornaments, and they wondered how they could steal them.
तात्पर्य
दिव्य का अर्थ होता है "सर्वश्रेष्ठ", "सबसे ऊपर" या "सुंदर"। हरिबाडे का अर्थ है "चोरी करना"। पराकार का अर्थ है "विधियाँ" या "उपाय"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)