श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 4: नाम-करण समारोह, बचपन की लीलाएँ, और चोरों का भगवान को हरना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  1.4.107 
এই-মত রঙ্গ করে বৈকুণ্ঠের রায
স্থির নহে এক-ঠাঞি, বুলযে সদায
एइ-मत रङ्ग करे वैकुण्ठेर राय
स्थिर नहे एक-ठाञि, बुलये सदाय
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वैकुण्ठ के भगवान ने निरंतर भ्रमण करते हुए अपनी लीलाएँ सम्पन्न कीं।
 
In this way, the Lord of Vaikuntha performed His pastimes while constantly wandering.
तात्पर्य
वैकुण्ठेरा राया शब्द वैकुण्ठ के राजा श्री नारायण के लिए है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)