श्री लघु भागवत अमृत(पूर्व 363, 385, 392 तथा 421)में कहा गया है कि "जैसे श्री कृष्ण आदि प्रभु हैं या जन्मरहित हैं, वैसे ही उनकी प्रकट और विलोप लीला अनादि हैं। भगवान् मुकुंद अपनी परम इच्छा से बार-बार इस संसार में अपनी प्रकट और विलोप लीला प्रकट करते हैं। वे अज या जन्मरहित हैं, फिर भी वे जन्म लेते हैं। कोई पूछ सकता है कि जो व्यक्ति जन्मरहित है, वह जन्म कैसे ले सकता है? यह पूरी तरह से विरोधाभासी प्रतीत होता है। इस विरोधाभास को समेटने के लिए कोई कह सकते हैं कि भगवान् अविज्ञात हैं, सम्पदाओं से परिपूर्ण और पूरी तरह से आध्यात्मिक हैं। भगवान् तथा उनके भक्तों में कायापलट का किंचित् भी अंश न होने के कारण वे दोनों जन्मरहित हैं; और यद्यपि उनका जन्म संभोग से नहीं होता है, लेकिन वे एक पवित्र हृदय में ठीक वैसे ही प्रकट होते हैं जैसे सूर्य पूर्व में प्रकट होता है और इसलिए वे जन्म भी लेते हैं। जिस तरह आभूषणों और लकड़ी में गर्मी के रूप में उपस्थित आग किसी खास कारण से प्रकट होती है, भगवान् कृष्ण किसी खास कारण से किसी खास समय पर प्रकट और विलोप लीला की अपनी अद्भुत लीला दिखाते हैं। प्रकट और विलोप लीला दिखाने का मुख्य कारण भक्तों को आशीर्वाद देना और अपनी प्रसिद्ध लीलाओं की महिमा का प्रसार करना है। उनकी उपस्थिति का एक और मुख्य कारण अपने प्रशंसकों भक्तों जैसे वसुदेव पर दया करना है, जिन्हें लगातार दुर्जेय राक्षस मारपीट करते रहते हैं। धरती के भार को कम करने के लिए भगवान् को ब्रह्मा और अन्य देवताओं की आज भी की गई प्रार्थनाएँ भगवान् की उपस्थिति के गौण कारण हैं। यदि उनके प्रिय भक्त उन्हें देखने को उत्सुक हैं, तो भगवान् कृष्ण, जो दया के सागर हैं, तुरंत उन्हें अपनी लीला दिखाते हैं। यहाँ तक कि आज भी कुछ भाग्यशाली भक्त जो प्रेम और भक्ति से अभिभूत रहते हैं, कृष्ण की वृंदावन की खेल-खेल लीला को ख़ुशी-ख़ुशी देखते हैं। इसलिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र भगवान् अपनी इच्छा से किसी के सामने भी प्रकट होते हैं; लेकिन क्योंकि वे भौतिक दृष्टि के विषय नहीं हैं, इसलिए भौतिक आँखों से उन्हें देखा नहीं जाता।" लघु भागवत अमृत(पूर्व 427) में अन्यत्र कहा गया है कि "यह श्रीमद भागवत और अन्य पुराणों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कृष्ण की लीला शाश्वत है।"
लगु-भागवत अमृत से उपरोक्त श्लोक की अपनी व्याख्या में श्रील बलदेव विद्याभूषण ने कहा है: "चूंकि भगवान के लीला क्रियाएं हैं, इसलिए उनके लिए शुरूआत और अंत होना चाहिए, अन्यथा लीलाएं पूरी नहीं हो सकती हैं। लेकिन यदि लीलाओं का आरंभ और अंत है, तो उन्हें शाश्वत कैसे माना जा सकता है? इसके उत्तर में गोपाल-तापनी में कहा गया है: एको पि सन बहुधा यो अवभति-’यद्यपि भगवान विष्णु एक हैं, फिर भी वे कई रूपों में प्रकट होते हैं’, और विष्णु पुराण में: एकानेक-स्वरूपाय-’भगवान विष्णु एक भी हैं और अनेक भी’। ये दोनों कथन परमेश्वर की असीमता को सिद्ध करते हैं। छान्दोग्य उपनिषद भगवान के भक्तों का वर्णन इस प्रकार करता है: सा एकधं भावति त्रिधा-’वह एक प्रकार का और तीन प्रकार का है’। छान्दोग्य उपनिषद के इस कथन से यह समझा जाता है कि भगवान विष्णु के प्रत्येक सहयोगी भी असीम हैं। इसके अलावा ऋग्वेद (1.54.6) में कहा गया है: परमं पदम अवभति भूरी-’कृष्ण का सर्वोच्च निवास असीमित रूप से प्रकट होता है’। ऋग्वेद के इस कथन से परमेश्वर के लीला स्थलों की असीमता भी पुष्ट होती है। परमेश्वर, उनके भक्तों और उनके निवास की असीमता को स्थापित करने वाले इन कथनों से यह समझा जाता है कि परमेश्वर की लीलाएँ अस्थायी नहीं हैं। भगवान के विभिन्न अवतारों की विभिन्न लीलाओं के शुरू और अंत के बावजूद, ऐसी सभी लीलाएं वास्तव में शाश्वत रूप से घटित होती हैं; वे बस एक स्थान पर शुरू होती हुई दूसरे स्थान पर समाप्त होती हुई प्रतीत होती हैं। इस प्रकार, क्योंकि लीलाओं में कोई अंतराल नहीं है, उन्हें शाश्वत कहा जाता है। यदि कोई यह स्वीकार करता है कि भगवान की लीलाएं अनन्त हैं, तो अभी भी संदेह हो सकता है कि चूंकि उनकी लीलाओं की शुरुआत होती है, तो उनका अंत अवश्य होना चाहिए। जवाब में, यह समझा जाता है कि यद्यपि भगवान के किसी विशेष रूप की लीलाएँ एक विशेष समय में होती हैं, फिर भी वे शाश्वत हैं। शंकराचार्य ने ब्रह्म-सूत्र (1.3.28) पर अपनी टीका में कहा है: "यदि कोई कहता है, "उसने पकाया है, उसने पकाया है," इसका मतलब यह नहीं है कि उसने दो बार पकाया है।" ब्रह्म-सूत्र (3.3.11) पर गोविंद-भाष्य में कहा गया है: "यदि कोई "गाय, गाय" कहता है, तो इसका मतलब दो गायें नहीं है।" इसलिए भले ही परमेश्वर के कई रूप हैं, लेकिन वे सभी एक हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। वेदों में कहा गया है: एको देवो नित्य-लीलानुक्तो भक्त-व्यापी भक्त-हृदय अंतर्-आत्मा-'एक सर्वोच्च भगवान विष्णु शाश्वत रूप से विविध लीलाओं में लिप्त हैं और अपने भक्तों के हृदयों में परमात्मा के रूप में स्थित हैं।' " श्रीमद् भागवतम् (3.2.15, 10.9.13, 10.14.22, 1.10.26) के साथ-साथ बृहद-वैष्णव-तोषणी से भी परामर्श किया जा सकता है, जिसमें कहा गया है:
नित्यावतारो भगवान नि या-मूर्तिर्जगत-पतिः
नित्य-रूपो नित्य-गंधो नित्यैश्वर्य सुखानुभूः
'भगवान लगातार अवतार के रूप में प्रकट होते हैं। ब्रह्मांड के स्वामी का शाश्वत रूप है, शाश्वत सुगंध है, शाश्वत वैभव है और वह शाश्वत आनंद से परिपूर्ण है।' पद्म पुराण (पाताल-खंड) निम्नलिखित प्रमाण देता है: पश्य त्वां दर्षयिष्यामि स्वरूपं वेद-गोपितम- "मैं तुम्हें अपना व्यक्तिगत रूप दिखाऊंगा, जो वेदों को अज्ञात है।"
इदम एव वदंति एते वेदः कारण-कारणम
सत्यं व्यापि परानंदं चिद्-घनं शाश्वतं शिवम
"वेदों की पुष्टि है कि मेरा यह रूप सभी कारणों का कारण है, सर्वव्यापी, परमानंदमय, ज्ञान से परिपूर्ण, शाश्वत, सर्व-मंगलमय परम सत्य है।"
अनाम-रूप एवायं भगवान हरि ईश्वरः
अकतेति च यो वेदः स्मृतिभिश्च अभिधीयते
"वह भगवान, भगवान हरि हैं, जिन्हें वेद और स्मृतियां नाम या रूप से रहित होने और करने के लिए कुछ भी नहीं होने के रूप में वर्णित करती हैं।"
सच्चिदानंद-रूपत्वात स्यात कृष्णो अधोक्षजो अप्य असौ
निज-शक्तेः प्रभावेण स्वं भक्तान दर्शयेत् प्रभुः
"अधोक्षज को कृष्ण कहा जाता है क्योंकि उसका शाश्वत रूप ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण होता है। वह अपनी ही शक्ति के प्रभाव से अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।" महाभारत (शांति 339.44-45) में कहा गया है:
एतत त्वया न विज्ञेयं रूपवान इति दृश्यते
इच्छन् मुहूर्तात् नश्येयं ईशोऽहं जगतां गुरुः।
माया ह्येषा मया सृष्टा यन्म माँ पश्यसि नारद।
सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैव त्वं ज्ञातुमर्हसि।
"मेरा एक भौतिक रूप है इसलिए यह मत सोचना कि मैं दिखाई देता हूँ। अगर मैं चाहूं तो एक पल में गायब हो सकता हूँ। मैं पूरे ब्रह्मांड का नियंत्रक और आध्यात्मिक गुरु हूँ। हे नारद, मेरा यह रूप जो तुम अब देख रहे हो, वह मायावी ऊर्जा का निर्माता है, इसलिए तुम्हें जानना चाहिए कि मैं भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से पूरी तरह अप्रभावित हूँ।" वासुदेव उपनिषद (6.5) में कहा गया है:
सद्रूपमद्वयं ब्रह्म मध्यद्यान्विवर्जितम्।
स्वप्रभं सच्चिदानन्दं भक्त्या जानाति चाव्ययम्।
"[भगवान का] पारलौकिक रूप निरपेक्ष सत्य है, जो द्वंद्व या शुरुआत, मध्य या अंत से रहित है। यह स्वयं प्रकाशित, शाश्वत और ज्ञान और आनंद से भरा है। केवल भक्ति सेवा के माध्यम से ही कोई उस रूप को अचूक समझ सकता है।" वासुदेवाध्यात्म में आगे कहा गया है:
अपसिद्धेस्तद्गुणानामनामौ सौ प्रकीर्तितः।
अप्राकृतत्वाद् रूपस्याप्य अरूपोऽसौ उदीर्यते।
सम्बन्धेन प्रधानस्य हरेर्नास्त्येव कर्तता।
अकर्तारमताः प्राहुः पुराणं तं पुराविदः।
"क्योंकि उनके गुण आमतौर पर अज्ञात हैं, इसलिए कहा जाता है कि उनका कोई नाम नहीं है। क्योंकि उनका रूप भौतिक नहीं है, इसलिए उन्हें निराकार कहा जाता है। और क्योंकि भगवान हरि भौतिक प्रकृति से संबंधित कुछ नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें निष्क्रिय कहा जाता है।" नारायणाध्यात्म में भी कहा गया है:
नित्याव्यक्तोऽपि भगवान् ईक्ष्यते निजशक्तितः।
तामृते परमात्मानं कः पश्यतामितां प्रभुम्।
"प्रभु, हालांकि वे शाश्वत रूप से प्रकट नहीं होते, उनकी अपनी ऊर्जा के द्वारा दिखाई देते हैं। उनकी ऊर्जा की सहायता के बिना, कौन उस अथाह प्रभु, परमात्मा को देख सकता है?" भगवान की उपस्थिति और गायब होने के बारे में ब्रह्मांड पुराण कहता है:
अनादेयं अहेयं च रूपं भगवतो हरिः।
आविर्भावतिरोभावाव अस्योक्रे ग्रहमोचने।
"भगवान हरि का रूप न तो घृणित है और न ही अस्वीकृति के लिए है। इस दुनिया में उनके प्रकट होने को 'उपस्थिति' कहा जाता है, और उनके प्रकट काल का अंत 'गायब होना' कहा जाता है।" श्रीमद भागवतम (4.23.11) पर अपनी टीका में श्री माधवाचार्य इस प्रकार लिखते हैं:
आविर्भावतिरोभावाव ज्ञानस्य ज्ञानिनोऽपि तु।
आपेक्षाज्ञास्तथा ज्ञानमुत्पन्नमिति चोच्यते।
"भगवान बुद्धिमानों के लिए प्रकट होते हैं और गायब होते हैं, लेकिन वे अज्ञानी को भी ज्ञान देने के लिए प्रकट होते हैं।" पद 52 में कहे वेद-"वेद वर्णन करते हैं" शब्दों के साक्ष्य गोपाल-तापनी उपनिषद (1.21) के निम्नलिखित कथनों में देखे जा सकते हैं: एको वशी सर्वगः कृष्ण ईड्यः -"वह एक कृष्ण भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है, और वह पूजा के योग्य हैं," और एकोऽपि सन बहुधा योऽवभति-"कृष्ण एक हैं, लेकिन वे असीमित रूपों और विस्तारित अवतारों में प्रकट होते हैं;" कथ उपनिषद (2.2.13): नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान-"अनगिनत शाश्वत जीवित इकाइयाँ हैं जो शाश्वत और पूरी तरह से सर्वोच्च एकवचन जीवित इकाई, सर्वोच्च भगवान पर निर्भर हैं;" छान्दोग्य उपनिषद (7.26.1): स एकधा भवति त्रिधा-"वह एक प्रकार और तीन प्रकार का है;" और भगवद-गीता (4.6) भी: अजोऽपि सन्नव्यात्मा-"हालांकि मैं अजन्मा हूँ और मेरा पारलौकिक शरीर कभी खराब नहीं होता।"
सर्वोच्च भगवान का काल एक अग्नि-चक्र की तरह अबाधित है; वे फलदायी श्रमिकों की अस्थायी कल्पना के उत्पाद नहीं हैं जो समय के साथ फीके पड़ जाते हैं। यह कहते हुए कि शाश्वत निरपेक्ष सत्य इस संसार में अपने पूर्ण आध्यात्मिक रूप में प्रकट होता है और फिर इसमें से गायब हो जाता है, वैदिक साहित्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रभु का शाश्वत काल इस अस्थायी भौतिक दुनिया में प्रदर्शित होता है। श्री चैतन्यदेव असीमित और पूर्ण हैं। चूंकि श्री चैतन्यदेव से संबंधित विषय उनसे अलग नहीं हैं, इसलिए ऐसे विषय भी बिना शुरुआत या अंत के हैं। वे पूरी तरह से स्वतंत्र और जीवित संस्थाओं के नियंत्रक हैं, इसलिए शिष्य उत्तराधिकार की प्रक्रिया का पालन करते हुए मैं जो कुछ भी लिखता हूं वह वह मुझे प्रेरित करते हैं।
