श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 3: भगवान के कुंडली की गणना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.3.12 
মহা-জ্যোতির্-বিত্ বিপ্র সবার অগ্রেতে
লগ্নে অনুরূপ কথা লাগিল কহিতে
महा-ज्योतिर्-वित् विप्र सबार अग्रेते
लग्ने अनुरूप कथा लागिल कहिते
 
 
अनुवाद
तब उस महान ज्योतिषी ब्राह्मण ने उपस्थित सभी लोगों के समक्ष बालक की कुंडली में विभिन्न भावों के लक्षणों के बारे में बोलना प्रारम्भ किया।
 
Then that great astrologer Brahmin started speaking about the characteristics of different houses in the boy's horoscope in front of all the people present.
तात्पर्य
नीलाम्बर चक्रवर्ती ज्योतिष विज्ञान के विद्वान अध्यापक थे। इसलिए उन्होंने वहाँ उपस्थित लोगों को भगवान की कुंडली के विभिन्न लग्न की व्याख्या करना शुरू किया। महा-ज्योति-विद शब्द की व्याख्या इस प्रकार की जाती है:

शंखे तैले तथा माँसे वैद्ये ज्योतिषिके द्विजे

यात्रायां पथि निद्रायां महच्छब्दो न दीयते

"यदि कोई महँ उपसर्ग जोड़ता है शंख (शंख), तैल (तेल), मांस (मांस), वैद्य (डॉक्टर), ज्योतिष (ज्योतिषी), ब्राह्मण, यात्रा (यात्रा), पथ (मार्ग), और निद्रा (नींद) यह एक विपरीत अर्थ उत्पन्न करेगा। इसलिए इन शब्दों में महा नहीं जोड़ना चाहिए। "लेकिन इस मामले में यह समझा जाना चाहिए कि नीलाम्बर चक्रवर्ती विद्वान थे और ज्योतिष विज्ञान में विशेषज्ञ थे। महा-ज्योति-विद शब्द उस व्यक्ति को भी इंगित कर सकता है जो आध्यात्मिक विज्ञान में विद्वान और विशेषज्ञ है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)