अद्वैत आचार्य का हृदय स्वभावतः करुणा से भरा हुआ था, अतः उन्होंने दयालुतापूर्वक इस बात पर विचार किया कि जीवों का उद्धार कैसे किया जाए।
Advaita Acharya's heart was naturally filled with compassion, so he compassionately considered how to save living beings.
तात्पर्य
अद्वैता प्रभु स्वभावतः करुणा के सागर थे। इस भौतिक लोक में करुणा के जो उदाहरण मिलते हैं वे उनकी करुणा के सामने नगण्य हैं। भगवान् विष्णु और वैष्णवों को ऐसी क्षुद्र निष्फल करुणा की आवश्यकता नहीं होती जैसी कि भौतिक शरीर पर दया करने या भौतिक सुख की अग्नि में घी डालने की अस्थायी करुणा होती है। दयालु भगवान् विष्णु और वैष्णव ठाकुर वास्तव में जीवों को उनके अनन्त कल्याण के लिए भौतिक बंधन से मुक्त करते हैं। इस भोगलोक में देखी जाने वाली कपटपूर्ण करुणा के उदाहरणों द्वारा जीवों को उनकी भोगवृत्ति से मुक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु से विमुख संसारी प्राणियों को उनकी काल्पनिक सुख-सुविधा की भोगवृत्ति से मुक्त कराने के लिए उन्हें उनकी सनातन स्थिति के प्रति जागरूक करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रत्यक्ष कृपा पाने की पात्रता विकसित करने में सहायता करनी चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥