न्याय आत्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधसा न बहुना श्रुतेन
यम एवैष वृणुते तेन लभ्यस
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वम्
"परमेश्वर का ज्ञान विशेषज्ञों के वक्तव्यों, विशाल बुद्धि या बहुत अधिक श्रवण से प्राप्त नहीं होता है। ये तो सिर्फ उन्हीं को प्राप्त होती है जिन्हें वो स्वयं चुनते हैं। ऐसे ही व्यक्ति को वे अपने रूप को प्रकट करते हैं।"
सर्वशक्तिमान भगवान कृष्ण ने अपने वैभव गुण को प्रकट किया और इस प्रकार भगवान ब्रह्मा को उनकी संवैधानिक स्थिति का एहसास करने और दिव्य ज्ञान का प्रसार करने के लिए सशक्त किया। इसके बाद ब्रह्मा के मुंह से ओम और अतः शब्द प्रकट हुए। परिणामस्वरूप, भगवान ब्रह्मा ने आरोही प्रक्रिया के बजाय अवरोही प्रक्रिया के माध्यम से सच्चे, चैतन्य और आनंदमय परमेश्वर के कारणरहित दयालु आगमन और अद्भुत विविध लीलाओं को समझा। इसकी पुष्टि श्रीमद भागवतम (1.1.1) में की गई है: "केवल वही हैं जिन्होंने सबसे पहले ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया था, जो मूल जीवित प्राणी हैं।"
निर्गुण भक्तों के मुँह से कृष्ण के शक्तिशाली महिमामंडन के बिना, जीवित संस्थाएँ कृष्ण से घृणा के रूप में माया के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाती हैं, भौतिक सुख से जन्मे बेजान शब्दों का उच्चारण करके।
