श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 9-11
 
 
श्लोक  1.2.9-11 
পূর্বে ব্রহ্মা জন্মিলেন নাভি-পদ্ম হৈতে
তথাপিহ শক্তি নাই কিছুই দেখিতে
তবে যবে সর্ব-ভাবে লৈলা শরণ
তবে প্রভু কৃপায দিলেন দরশন
তবে কৃষ্ণ-কৃপায স্ফুরিল সরস্বতী
তবে সে জানিলা সর্ব-অবতার-স্থিতি
पूर्वे ब्रह्मा जन्मिलेन नाभि-पद्म हैते
तथापिह शक्ति नाइ किछुइ देखिते
तबे यबे सर्व-भावे लैला शरण
तबे प्रभु कृपाय दिलेन दरशन
तबे कृष्ण-कृपाय स्फुरिल सरस्वती
तबे से जानिला सर्व-अवतार-स्थिति
 
 
अनुवाद
सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल से ब्रह्माजी का जन्म हुआ। फिर भी, उनमें कुछ भी देखने की शक्ति नहीं थी। जब ब्रह्माजी ने भगवान की पूर्ण शरण ली, तो करुणावश भगवान उनके समक्ष प्रकट हुए। तब, कृष्ण की कृपा से, ब्रह्माजी को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे वे परमेश्वर के विभिन्न अवतारों को समझ सके।
 
At the beginning of creation, Brahma was born from the lotus that emerged from Lord Vishnu's navel. Yet, he lacked the power to see anything. When Brahma surrendered completely to the Lord, the Lord appeared before him out of compassion. Then, by Krishna's grace, Brahma gained divine knowledge, enabling him to understand the various incarnations of the Supreme Lord.
तात्पर्य
महाभारत (शांति 347.40-43) में ब्रह्मा के सात अलग-अलग जीवन का वर्णन किया गया है। कमल से जन्म लेने के अलावा, ब्रह्मा का जन्म मन, आँखों, वाणी, कानों, नाक और अंडे से भी हुआ था। जब ब्रह्मा का जन्म कमल से हुआ, तो उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अपने पूजनीय भगवान को नहीं देख सके। इसके बाद उन्होंने परमेश्वर की शरण ली और उन्हें देख पाए। इसलिए वेदों में कहा गया है (कठ उपनिषद 1.2.23 और मुंडक उपनिषद 3.2.3):

न्याय आत्मा प्रवचनेन लभ्यो

न मेधसा न बहुना श्रुतेन

यम एवैष वृणुते तेन लभ्यस

तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वम्

"परमेश्वर का ज्ञान विशेषज्ञों के वक्तव्यों, विशाल बुद्धि या बहुत अधिक श्रवण से प्राप्त नहीं होता है। ये तो सिर्फ उन्हीं को प्राप्त होती है जिन्हें वो स्वयं चुनते हैं। ऐसे ही व्यक्ति को वे अपने रूप को प्रकट करते हैं।"

सर्वशक्तिमान भगवान कृष्ण ने अपने वैभव गुण को प्रकट किया और इस प्रकार भगवान ब्रह्मा को उनकी संवैधानिक स्थिति का एहसास करने और दिव्य ज्ञान का प्रसार करने के लिए सशक्त किया। इसके बाद ब्रह्मा के मुंह से ओम और अतः शब्द प्रकट हुए। परिणामस्वरूप, भगवान ब्रह्मा ने आरोही प्रक्रिया के बजाय अवरोही प्रक्रिया के माध्यम से सच्चे, चैतन्य और आनंदमय परमेश्वर के कारणरहित दयालु आगमन और अद्भुत विविध लीलाओं को समझा। इसकी पुष्टि श्रीमद भागवतम (1.1.1) में की गई है: "केवल वही हैं जिन्होंने सबसे पहले ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया था, जो मूल जीवित प्राणी हैं।"

निर्गुण भक्तों के मुँह से कृष्ण के शक्तिशाली महिमामंडन के बिना, जीवित संस्थाएँ कृष्ण से घृणा के रूप में माया के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाती हैं, भौतिक सुख से जन्मे बेजान शब्दों का उच्चारण करके।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)