श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.2.88 
নিরবধি নৃত্য, গীত, বাদ্য-কোলাহল
না শুনে কৃষ্ণের নাম পরম মঙ্গল
निरवधि नृत्य, गीत, वाद्य-कोलाहल
ना शुने कृष्णेर नाम परम मङ्गल
 
 
अनुवाद
लोग निरन्तर नाचते, गाते और संगीत वाद्य बजाते रहते थे, किन्तु उन्होंने कभी भी कृष्ण के परम मंगलमय नामों को नहीं सुना।
 
People were constantly dancing, singing and playing musical instruments, but they never heard the most auspicious names of Krishna.
तात्पर्य
नृत्य, गायन और वाद्य यंत्रों का बजाना नशा है, जिसे तकनीकी रूप से तौर्यत्रिका के नाम से जाना जाता है। जो व्यक्ति शुभता की आकांक्षा करते हैं, उन्हें कभी भी इस तरह की गतिविधियों के प्रभाव में नहीं आना चाहिए। इस तरह की गतिविधियाँ व्यक्ति को कृष्ण को भूलने के लिए प्रेरित करती हैं, लेकिन कृष्ण की सेवा के लिए नृत्य, गायन और वाद्ययंत्र बजाना कृष्ण चेतना विकसित करने का एक रूप है। इस तरह की प्रक्रियाओं से, जीव को सर्वोच्च लाभ होता है। जो लोग अपने भौतिक सुख के लिए लालच में आकर नृत्य, गायन और वाद्ययंत्र बजाते समय कृष्ण की सेवा करने का इरादा छोड़ देते हैं, वे कृष्ण के नामों का जप करने में असमर्थ होते हैं, जो सर्वोच्च लाभ प्रदान करते हैं। भौतिक ध्वनि कंपन कभी भी किसी को कृष्ण चेतना विकसित करने की अनुमति नहीं देते हैं, बल्कि वे व्यक्ति को इंद्रियों की तृप्ति में व्यस्त रहने के लिए आकर्षित करते हैं और इस तरह सब कुछ खराब कर देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)