श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.2.84 
অতএব অদ্বৈত—বৈষ্ণব-অগ্রগণ্য
নিখিল-ব্রহ্মাণ্ডে যাঙ্র ভক্তি-যোগ ধন্য
अतएव अद्वैत—वैष्णव-अग्रगण्य
निखिल-ब्रह्माण्डे याङ्र भक्ति-योग धन्य
 
 
अनुवाद
अतः अद्वैत आचार्य सभी वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में उनकी भक्ति की कोई तुलना नहीं है।
 
Therefore, Advaita Acharya is the best of all Vaishnavas. His devotion is unparalleled in the entire universe.
तात्पर्य
इन्हीं सब कारणों से श्री अद्वैत प्रभु वैष्णवों में सर्वप्रथम और श्रेष्ठ हैं। वे समस्त ब्रह्मांड में सबसे महान भक्त के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस संसार में हरि की सेवा में लीन कोई भक्त उनके जैसा नहीं है। वे स्वयं विष्णु-तत्त्व हैं, और एक आचार्य के रूप में, वे एक भक्त के अवतार हैं और हरि के समान ही अच्छे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)