महाभारत-तात्पर्य (१.५३) में उल्लिखित है:
परमो विष्णुर एकस तज ज्ञानं मुक्ति-साधन
शास्त्राणां निर्णयस त बेष तद अन्यद मोहनाय हि
"विष्णु ही एकमात्र परमेश्वर हैं। उनका ज्ञान ही मुक्ति का साधन है। वे ही शास्त्रों का उद्देश्य हैं। इसके अतिरिक्त किसी और निष्कर्ष पर पहुंचना भ्रम का कारण है।"
श्री अद्वैत आचार्य हमेशा यह उपदेश देते थे कि व्यक्ति को सदा कृष्ण के चरणकमलों की शरण लेनी चाहिए, क्योंकि यह तीनों लोकों के सभी शास्त्रों का सार और लक्ष्य है। श्री अद्वैत प्रभु ने उपदेश दिया कि कृष्ण के प्रति भक्तिभावना ही सभी शास्त्रों का सार है और श्रीमद् भगवतम का एकमात्र उद्देश्य है, जो ब्रह्म-सूत्रों पर श्री व्यासदेव की स्वाभाविक टिप्पणी है, जो सभी शास्त्रों का स्रोत है। श्रीमद् भागवतम का प्रचार करके, उन्होंने शुद्ध भक्ति की विरोधी सभी प्रकार की झूठी अटकलों और निष्कर्षों की जांच की। इस प्रकार उन्होंने अपने श्रोताओं के दिलों में सर्वोच्च प्रभु के प्रति सेवा का भाव स्थापित करने का प्रयास किया।
