प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती
वितन्वताजस्य सतीꣳ स्मृतिꣳ हृदि
स्व-लक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यतः
स मे ऋषीणाम् ऋषभः प्रसीदताम्
अनुवाद
जिन्होंने सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा के प्रबल ज्ञान को अपने हृदय में प्रकट किया, उन्हें सृष्टि तथा अपने स्वरूप का पूर्ण ज्ञान दिया, तथा जो ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, वे भगवान मुझ पर प्रसन्न हों।
May the Lord, who manifested the powerful knowledge of Brahma in his heart at the beginning of creation, who gave him complete knowledge of creation and his own form, and who was born from the mouth of Brahma, be pleased with me.
तात्पर्य
जब महाराजा परीक्षित ने श्री सुकादेव गोस्वामी से भगवान हरि के सृजन कर्म के विषय में प्रश्न किया, तब श्री सुकादेव गोस्वामी पहले परम भगवान का स्मरण किया और फिर प्रार्थनाएँ अर्पित कीं, जैसा कि श्रीमद् भागवतम (२.४.२२) में यह छंद है। श्रीमद् भागवतम में कई अंश हैं जिनमें वर्णन किया गया है कि किस प्रकार ब्रह्म-सम्प्रदाय के मूल गुरु भगवान ब्रह्मा श्रीमद् भागवतम, वेदों के पके हुए फल को भगवान नारायण से सुनते थे। वे कुछ अंश इस प्रकार हैं: तेने ब्रह्म हृदया आदि-कवये-"केवल वही हैं जिन्होंने सबसे पहले वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी के हृदय में दिया था, जो मूल सजीव प्राणी थे।" (भाग. १.१.१); मायादौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मद्-आत्मकः-"मैंने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान इसलिए दिया क्योंकि मैं खुद वेदों में विख्यापित सभी धार्मिक सिद्धांत हूँ।" (भाग. ११.१४.३); इदं भागवता पूर्वं ब्रह्मणे नाभि-पंकज-सम्प्रकाशितम्-"यह श्रीमद् भागवतम भगवान ने सबसे पहले ब्रह्मा को पूर्ण रूप से प्रकट किया था।" (भाग. १२.१३.१०); कस्मै येन विभासितो यम अतुलो ज्ञान-प्रदीपः पुरा-"शुरुआत में किसने ब्रह्मा को व्यक्तिगत रूप से ज्ञान की इस अतुलनीय मशाल को प्रकट किया था।" (भाग. १२.१३.१९); और य इदं कृपया कस्मै व्याचचक्षे मुमुक्षवे-"जो ब्रह्मा को दया करके उन्होंने यह विज्ञान उस समय समझाया जब वे मुक्ति की इच्छा से व्याकुल थे।" (भाग. १२.१३.२०) इस तथ्य की पुष्टि श्वेताश्वतर उपनिषद (६.१८) में भी इस प्रकार की गई है: यो ब्रह्माणं विदधति पूर्वं यो वै वेदांश च प्रहिणोति तस्मै तं ह देवं आत्म-बुद्धि-प्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणं अहं प्रपद्ये "क्योंकि मैं मुक्ति की इच्छा रखता हूँ, इसलिए मैं उस परम पुरुष को समर्पण कर दूँगा, जिसने सबसे पहले भगवान ब्रह्मा को ब्रह्मा के हृदय के माध्यम से वेदों का ज्ञान दिया था। भगवान सभी ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का मूल स्रोत हैं।" श्वेताश्वतर उपनिषद (६.१८) में भी कहा गया है: वेदान्ते परमं गुह्यं पुरा कल्पे प्रचोदितम्-"वेदों का गोपनीय ज्ञान बहुत पहले पिछले कल्प में बोला गया था।" और बृहद-आरण्यक उपनिषद (४.५.११) में कहा गया है: अस्य महातो भूतस्य निःश्वसितं एतद यद ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो थाथर्वंगिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानान्यस्य एव एतानि सर्वाणि निःश्वसितानि-"ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद, ब्राह्मणों द्वारा जपे जाने वाले श्लोक या मंत्र, सूत्र या वैदिक कथनों का संग्रह, साथ ही विद्या, पारलौकिक ज्ञान और सूत्रों और मंत्रों की व्याख्याएँ सभी महान भगवान की सांसों से निकले हुए अंश हैं।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥