श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 1: आदि-खण्ड  »  अध्याय 2: भगवान का अवतरण  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  1.2.75 
বলিলেও কেহ নাহি লয কৃষ্ণ-নাম!
নিরবধি বিদ্যা-কুল করেন ব্যাখ্যান
बलिलेओ केह नाहि लय कृष्ण-नाम!
निरवधि विद्या-कुल करेन व्याख्यान
 
 
अनुवाद
"लोग कृष्ण के नामों का जाप नहीं करेंगे, भले ही उन्हें निर्देश दिया जाए! बल्कि, वे निरंतर अपनी शिक्षा और अच्छे जन्म का गुणगान करते हैं।"
 
"People will not chant the names of Krishna, even if they are instructed to! Rather, they constantly praise their education and good birth."
तात्पर्य
जब एक निष्‍काम भक्‍त कृष्ण के नाम का जाप करते हैं, तो कृष्ण-भक्‍त न होते हुए भी, सांसारिक सुखों में आसक्‍त रहते हुए, तथा सांसारिक ज्ञान में अपनी श्रेष्‍ठता दर्शाते हुए, निष्‍काम भक्‍तों या परमहंस वैष्‍णवों के भक्ति-पद्धति को तुच्‍छ समझते हैं। ऐसे लोगों के विषय में ठाकुर श्री नरहरि ने गाया है:

नितई ना बोलिला मुखे, मजिला संसार-सुखे,

विद्या-कुले कि करिबे तारा।

से सम्बन्ध नाही यारा, वृथा जनम गेलो तारा,

सेई पशु बड़ा दुराचार।

"जो नित्यानंद के नामों का उच्‍चारण नहीं करते, वे सांसारिक सुखों में फंसे रहते हैं। ऐसे व्‍यक्ति के लिए विद्या या तथाकथित शैक्षणिक शिक्षा और कुल या महान परिवार या महान राष्‍ट्र में जन्‍म का क्‍या लाभ है? जिसका नित्यानंद से कोई संबंध नहीं, वह केवल अपने मानवीय जीवन को बरबाद कर रहा है। ऐसे व्‍यक्ति बेलगाम जानवरों के समान हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)