भारतं सर्व-शास्त्रेषु भारते गीतिकां वरा
विष्णोः सहस्र-नामापि गेयां पाठ्यं च तद् द्वयं
"महाभारत सभी शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ है, और भगवद-गीता और विष्णु-सहस्र-नाम महाभारत के सबसे श्रेष्ठ भाग हैं। उनका हमेशा अध्ययन और पाठ किया जाना चाहिए।"
भगवान श्री कृष्ण भगवद-गीता के वक्ता हैं, और अर्जुन श्रोता हैं। श्रीमद भगवद-गीता में अठारह अध्यायों में 700 श्लोक हैं और महाभारत के भीष्म-पर्व में पाए जाते हैं। यह आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाने वाली पहली पुस्तक है।
श्रीमद् भागवतम में 18,000 छंद हैं और यह श्री व्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों में से एक है। यह सात्वत-पुराणों का मुकुटमणि है। इस निर्मल पुराण को सात्वत-संहिता या परमहंस भी कहा जाता है, जो हंस जैसे व्यक्तियों के लिए है। गरुड़ पुराण में कहा गया है:
अर्थो ऽयं ब्रह्म-सूत्राणां भारतार्थ विनिर्णयः
गायत्री भाष्य-रूपो ऽसौ वेदार्थ-परिबृंंहितः
"वेदांत-सूत्रों का अर्थ, महाभारत का पूर्ण आशय, ब्रह्म-गायत्री पर भाष्य और वेदों का पूर्ण विस्तृत ज्ञान सभी श्रीमद् भागवतम में मौजूद हैं।" इस कथन से यह समझा जाता है कि सभी साहित्यों का यह सम्राट या निर्मल प्रमाण, उपनिषदों की तरह एक श्रुति भी है (श्रीमद् भागवतम 1.4.7 देखें, जो शौनक ऋषि ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्री शुकदेव गोस्वामी से कहा था); यह ब्रह्म-सूत्रों की तरह न्याय भी है (श्रीमद् भागवतम 12.13.15 देखें); और यह महाभारत और पुराणों की तरह स्मृति भी है। श्रीमद् भागवतम की महिमा के बारे में, कोई चैतन्य-भागवत, मध्य-खंड, अध्याय इक्कीस और अंत्य-खंड, अध्याय तीन; चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला, अध्याय एक, मध्य-लीला, अध्याय बीस, चौबीस और पच्चीस, अंत्य-लीला, अध्याय पांच, सात और तेरह; और श्रील जीव गोस्वामी प्रभु के तत्व-संदर्भ (18-28) में विचारों का उल्लेख कर सकता है। इस साहित्य पर हमेशा मुक्त हंस जैसे वैष्णवों के बीच चर्चा होती है।
उस समय जो लोग भगवद-गीता और श्रीमद् भागवतम जैसे शुद्ध भक्ति साहित्य का अध्ययन करते थे, उन्होंने कभी यह नहीं समझाया कि सर्वोच्च भगवान की पूजा करना ही जीवों का एकमात्र कर्तव्य है। भगवद-गीता और श्रीमद् भागवतम का उनका पाठ और शिक्षा तत्काल इंद्रिय तृप्ति प्राप्त करने के लिए था, और इस प्रकार उन्होंने इन दोनों पुस्तकों के अर्थों को मोड़ दिया ताकि वे उन्हें साधारण पुस्तक सप्तशती-चंडी की तरह दिखा सकें, जिसका उद्देश्य किसी की इंद्रियों को संतुष्ट करना है। और अविश्वासी समुदाय वर्तमान में इस तरह से गीता और भागवत का पाठ करते हैं। गीता और भागवत का कंडीशनर आत्माओं द्वारा इस तरह का पाठ, जो केवल कामुक सुख में रुचि रखते हैं, किसी की उन्नति के लिए एक बाधा है और केवल उसे नरक की ओर ले जाता है, क्योंकि यह कभी भी गीता और भागवत का पाठ नहीं है। बल्कि, ऐसा पाठ इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए सामान्य सांसारिक शब्दों का एक संग्रह है। श्री भगवद-गीता और श्रीमद् भागवतम सभी शास्त्रों के शिखर रत्न हैं, वे उतने ही महान और आश्रय लेने योग्य हैं जितने कृष्ण, और वे श्री-कृष्ण-कीर्तन की पारलौकिक अभिव्यक्तियाँ हैं। वे न तो सांसारिक दार्शनिक पुस्तकें हैं और न ही साधारण कविताएँ जो भौतिकवादी लोगों के सांसारिक कानों और जुबान तक पहुँचती हैं। कामुक सुख में रुचि रखने वाले वक्ताओं और श्रोताओं का यह वर्ग हमेशा उदार महाप्रभु की दयालु दृष्टि से वंचित रहता है।
