অতি-বড সুকৃতি সে স্নানের সময
’গোবিন্দ’ ’পুণ্ডরীকাক্ষ’-নাম উচ্চারয
अति-वड सुकृति से स्नानेर समय
’गोविन्द’ ’पुण्डरीकाक्ष’-नाम उच्चारय
अनुवाद
केवल परम पवित्र लोग ही स्नान के समय पुण्डरीकाक्ष और गोविन्द का नाम लेते थे।
Only the most pious people took the name of Pundarikaksha and Govinda while bathing.
तात्पर्य
इस सङ्कीर्तन आन्दोलन का उद्घाटन करने से पहले, तथाकथित पवित्र और धर्मनिष्ठ व्यक्ति गोविन्द और पुण्डरीकाक्ष के नाम केवल स्नान के समय ही लेते थे ताकि पानी से अपने पापों को साफ़ कर सकें। वे इसे एक पारम्परिक सामाजिक कुप्रथा मानते थे। अन्यथा, ये लोग कभी भी भूलकर भी विष्णु का नाम नहीं लेते थे। बल्कि, उनका मानना था कि हर समय हर कोई गोविन्द और पुण्डरीकाक्ष का नाम निषेध माना जाता है। उनका मानना था कि गोविन्द और पुण्डरीकाक्ष का नाम करने अयोग्य व्यक्ति द्वारा या अयोग्य समय पर नहीं लिया जाना चाहिए। जीवों के सबसे महान मित्र, श्री चैतन्यदेव के नामनाम अकारी शिकाष्टक पद द्वारा इस विचार पर अंततः विराम लगा दिया गया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥